Living life according to the Gospel of Jesus Christ (मसीही के सुसमाचार अनुसार जिया हुआ जीवन)

Living life according to the Gospel of Jesus Christ
(मसीही के सुसमाचार अनुसार जिया हुआ जीवन)

Series Introduction / श्रृंखला परिचय

If God wills, with the permission of this congregation and its leadership, I will teach here about 6 times over the course of this year.

As I was meditating on what I wanted to teach over the course of those 6 opportunities, I was confronted with the question: What is the most central, crucial imperative message in the Bible. More important than answers to relevant questions like: How to be a good man/woman? How to be a good husband/wife? A good father/mother? More important than answers to what was before the earth and what is after? More important than a solid understanding of what trinity is or what the gifts of the Holy Spirit are?

Well I think, if we read the Bible like Jesus read the Bible, we see that for Him the most central message of the scriptures was Himself. For Jesus the most central theme of the Bible was the arrival of the Son of man. For Jesus the most important message in the scriptures was the good news of the Kingdom of God. The point being, as far as Jesus was concerned, the central theme of the scripture was the God News of the Kingdom of God, and how his birth, life, death and resurrection heralded it.

If that is true, then we have to consider this. Have we heard enough of this Gospel? Do we know the Gospel enough? Do we understand the Gospel enough. If Jesus spent a majority of his ministry on Earth preaching the Gospel, then we who call ourselves the disciples of this very same Jesus, shouldn’t we inspect the claims of this Gospel more often? Shouldn’t we immerse ourselves, with regularity in the truths of this Gospel? Shouldn’t we, the disciple of this Jewish Carpenter, grow deep roots into the Gospel he preached.

Shouldn’t we do that, to not only be filled with this Gospel: in all its truth, might and glory. But to overflow with it, so that anyone God places in our life, anyone who comes in contact with us, cannot be left unchanged by it.

So for the next 6 times I am here, I have one goal. To preach the Gospel, so that we, yes you and me, may understand it better and live by it.

अगर प्रभु की इच्छा हों, और इस कलिस्या और उसके पादरी साहब की इच्छा बानी रहें तो इस साल मैं यहाँ ६ बार आकर प्रभु के वचन की सेवा करूँगा।

और जब मैं इस बात पर मनन कर रहा  था की मैं किस विषय मैं आपको प्रभोदन दू तब मेरे मन मैं यह सवाल आया: पवित्र वचन का सबसे मुख्य और अनिवार्य विषय क्या हैं? बाइबिल मैं वह क्या विषय हैं जो एक अच्छे पुरुष या स्त्री, या एक अच्छे माता-पिता, या एक अच्छे पति-पत्नी होने से भी जरूरी हैं? इस पवित्र वचन का मूल एवं सबसे महत्वपूर्ण विषय क्या हैं?

अगर हम प्रभु के वचन को, प्रभु येशु मसीह ने जैसा पड़ा वैसे पड़े हमें यह समज आती हैं की प्रभु येसु के लिए बाइबिल का सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण विषय वे खुद हैं. अर्थार्थ, प्रभु इसु मसीह के लिए उनके यानि प्रभु के पुत्र का इस भूमि मैं आगमन के आगे और कोई विषय नहीं. प्रभु इसु मसीह के लिए पृथ्वी मैं प्रभु के राज्य के आगमन से ज्यादा महत्वपूर्ण कोई बात इस बाइबिल मैं कहीं नहीं हैं. प्रभु इसु मसीह के लिए पवित्र वचन का सबसे मुख्य विषय उनके जनम, जीवन, मरण और जी उठने के द्वारा स्थापित हुआ प्रभु का राज, दूसरे शब्दों में: प्रभु इसु मसीह का सुसमाचार हैं.

और अगर यह सच हैं तो हमें यह विचार करना पड़ेगा की क्या हमने प्रभु इसु मसीह के इस सुसमाचार को जितना सुनना और मनन करना चाहिए, उतना किया हैं. क्या हम इस सुसमाचार को अपने पुरे मन से समझते हैं. क्या हमने इस सुसमाचार का बारीकी से विश्लेषण किया हैं? क्या हमें यह सुसमाचार बार बार अपनों और अपने आप को सुनाना नहीं चाहिए?

मेरा विचार यह हैं की हम सब को प्रभु इसु मसीह के सुसमाचार से इतना परिचय हों की न केवल हमारा जीवन उसके सच के अनुसार गुजरे पर वे जीवन जो हमसे सम्पर्क मैं आये वे सदा के लिए बदल जाए.

इस कारण मेरा यह परिश्रम रहेगा, की आज और अगले पांच बार जब मैं यहाँ आउ तब मैं वचन से आपको प्रभु इसु मसीह के सुसमाचार पर प्रभोदन दू.

What is the Gospel of Jesus Christ? / प्रभु यीशु मसीह का सुसमाचार क्या है?

So before we delve into this five part series on the Gospel, today let's first take some time to establish a foundational understanding of the truth claims of this good news of the Kingdom of God, as laid down in the Word of God.

And the best anchor verse for this is the words of Jesus himself in John 3:16

...For God so loved the world that he gave his only Son, that whoever believes in him should not perish but have eternal life.  (John 3:16 ESV)

The claims Jesus makes here about the Gospel has to do with four things: God’s motivation in Gospel, God’s purpose in Gospel, God’s work in Gospel and Man’s correct response towards Gospel. And we will now go over them one after the other.

हम इससे पहले की प्रभु इसु मसीह के सुसमाचार के बारे मैं और ज्यादा मनन करे, मैं समझता हूँ की यह जरूरी हैं हम इस सुसमाचार के मौलिक बातों को पवित्र वचन में से अच्छे से समझे। और इसके लिए योहना के सुसमाचार तीसरे अध्याय के सोल्वे वचन से बेहतर कोई वचन नहीं। तो चले मेरे साथ योहना के सुसमाचार तीसरे अध्याय और  सोल्वे वचन: [READ FROM THE BIBLE]

इस वचन मैं प्रभु इसु मसीह बाइबिल मे प्रस्तुत सुसमाचार के विषय मे चार दावा करते है. ये दावे सुसमाचार मे प्रभु की प्रेरणा, उद्देश्य, कार्य और मनुष्य का सुसमाचार के प्रति सही प्रतीयक्रिया का उल्लेख करती हैं. अब हम इन चारो दावों को एक एक कर विचार और वर्णन करेंगे।

First, Jesus in John 3:16 reveals God’s motivation in Gospel: His Love for the World. God created the world to love and to be loved. But because of Adam and Eve’s sin man fell and that caused a deep divide in this relationship between the creator and the created. And now mankind finds itself incapable of loving God. But God doesn’t leave us in this state. God decides to act. God decides to save. And what motivates God in doing so is his love for this world that he has created. Especially mankind whom he has created to love and to be loved by.

सबसे पहले इशू जोहन्ना के तीसरी अध्याय के सोल्वे वचन मैं प्रभु का सुसमाचार मे क्या प्रेरणा है, इस पर प्रबोधन देते है. मसीही कहता है की प्रभु ने हमें यह सुसमाचार, उसके हमारे प्रति प्रेम के कारण दिया हैं. आदि मे प्रभु ने हमे प्रेम करने और प्रेम पाने के लिए श्रिस्टी की थी. परंतु आदम और हौवा के पाप के कारण हमारे और प्रभु के मध्य एक बड़ा दरार आ गया है. अब मनुष्य प्रभु के संग एक सच्ची प्रेम बंदन में जुड़ने को सक्षम नही है.पर प्रभु अपने सृष्टि, प्रत्येक तौर से मनुष्य के प्रति बेहद प्रेम के कारण चुप न रहता. बजाय सुसमाचार द्वारा हमारे उद्धार का काम प्रारम्भ करता है.

Second, Jesus talks about God’s purpose in the Gospel: To give us eternal life. Because of our broken relationship with God we are cursed to live a broken and hard life that ends in death. Death is a reality for all of us. There is a saying that goes: Death and Taxes comes for all. The world struggles with the concept of Death. It either claims that there is nothing after death, or that you are born into another life after death.

God through Jesus has a greater purpose for our lives after death. God restores us in a relationship with him and grants us eternal life. Thus God’s purpose in the Gospel is to grant us eternal life.

उसके बाद प्रभु इशू इस वचन द्वारा, सुसमाचार मैं उनका क्या उद्देश्य है, इसपर व्याख्या करते है. सुसमाचार का उद्देश्य यह हैं की उसके द्वारा हमे अनंत जीवन प्राप्त हो. हमारे पापों के कारण अपने और प्रभु के बीच जो दरार आ गया हैं उसके कारण हमारी जीवन कष्टदायी और कठोर बन गयी हैं। साथ ही साथ हम सभ का अंत मृत्यु मैं निश्चित हैं. अंग्रेजी मैं एक कहावत हैं की: मृत्यु और कर का सबसे परिचय होता हैं.

यह दुनिया मृत्यु को समझने और समझाने से कतराती  हैं. कुछ कहते हैं की मृत्यु के बात कुछ भी नहीं. और कुछ कहते हैं की मरण के पश्चात अपने कर्म के अनुसार हमें पुनर्जन्म प्राप्त होता है.

पर सुसमाचार कहता है की प्रभु सुसमाचार के द्वारा मृत्यु के पश्चात अपने साथ अनन्तः जीवन प्रधान करता हैं. अर्थार्थ प्राभु का सुसमाचार में उद्देश्य हमारा अनंत जीवन हैं.

Third, Jesus lays out God’s work in Gospel. The world says that if you want salvation you need to work for it. Some religions say that if you do enough good works at the end of life God will send you to heaven. Other religions says that if through a lengthy process of life and death, rebirths, you can accumulate enough good works, you get to be one with God. Either way salvation is a mountain to be climbed, a hard and impossible task to be achieved.

But the God of the Bible, through the gospel has a different plan for our salvation. According to the Gospel of Jesus Christ, God does the work. He sends his son, who lives a righteous life for us, then dies the death of a sinner in our stead and finally gains victory over death by being resurrected so that we may have a new eternal life in Him.

Do you see how the work done to give us salvation and eternal life is done by God and not us. And when we place our faith in this saving work of Christ Jesus the righteousness of Christ is counted as ours, on the basis of which we inherit eternal life. Paul talks about this very reality when he writes in 2 Cor 5:21:

For our sake he made him to be sin who knew no sin, so that in him we might become the righteousness of God.  (2 Corinthians 5:21 ESV)

तीसरा, प्रभु इशू मसीह इस वचन मैं प्रभु के उस काम का उल्लेख करते हैं जिसके तहत हमारा उधर सफल होता हैं. इस दुनिया के धर्म और निति कहते हैं की अगर तुम्हे उधार चाहिए तो यह पहाड़ चङो या यहाँ इतने नारियल फोड़ो। यह दुनिया हमारे उधर के लिए हमसे ही उसकी कीमत मांगती हैं. पर हममे कोई नहीं हैं जो हमारे उधर की कीमत अर्थार्थ हमारे पापो की सजा को दे सकता हैं.

इसी कारण परमेश्वर ने पवित्रवचन के सुसमाचार मैं हमारे उधार की कीमत खुद भुक्ता की. कैसे? अपने एकलौते पुत्र के द्वारा. येसु मसीह, प्रभु के एकलौते पुत्र ने अपने धर्मी जीवन, क्रूस मैं हमारे पापो के जगह में मरण, और उसके पश्चात उस मरण के ऊपर विजय के द्वारा हमारा उधार हमारे लिए प्राप्थ किया है.

और जब हम प्रभु के इस उधर के काम पर हमारा विश्वास रकते हैं तब प्रभु येशु मसीह की धार्मिकता प्रभु के सिंहासन के सामने हमारी धार्मिकता बन जाती है.

इस विषय मे प्रेरित पौलुस कुरुन्थियो को लिखे दुसरे पत्री मे उसके पांचवे अध्याय के इकीसवे वचन मे कहता हे: [READ FROM THE BIBLE]


And now the fourth and final claim Jesus makes about the Gospel is as follows: The Gospel is exclusive. In other words, the Gospel is not good news for all. If we hear the Gospel and reject its claims, the Gospel is in fact bad news for us. As we read in John 3:18, right below John 3:16, it says:

Whoever believes in him is not condemned, but whoever does not believe is condemned already, because he has not believed in the name of the only Son of God.  (John 3:18 ESV)

चौथा और आखिर प्रभु इशू इस वचन मैं यह दावा करते है की यह सुसमाचार मनुष्य के उधर का एकलौता उपाय है. और अगर हम इस सुसमाचार के सच्चाई को ठुकराये फिर हम अनन्त कल के लिए प्रभु के दंड के भोगी है। यूहन्ना ३:१८ में हम यह पढते है: [READ FROM THE BIBLE]

The Gospel is exclusive in this that salvation comes only through Christ Jesus and is available only to those that place their faith in the saving work of God through Him. And not only do you have to believe in Jesus as the Son of God, you have to believe in Jesus as the only Son of God.

प्रभु येसु का सुसमाचार अपने आप मे इस तरह विशिष्ट है की सुसमाचार द्वारा प्रधान किया गया उधार सिर्फ उनको उपलभ्द है जो प्रभु येसु मसीह पर अपना विश्वास जताते है. वचन जो हमने अभी पड़ा वह तो यह कहता है की हमारा यह विश्वास होना चाहिए की येसु मसीह सारे संसार के परमेश्वर का एकलौता पुत्र है और उसके समान विसवास्योग्य कोई नहीं.

In other words to put your faith in Jesus Christ, you have to first forsake your faith in all other Gods. Because the Bible's claim of Lordship is exclusive in Lord Jesus as the only Son of God, and him alone.

तो फिर हम यह कह सकते है की पवित्र वचन के अनुसार अगर हम प्रभु येसु मसीह पर सच्चा विश्वास करते है, तो उसके लिए उन हर देवी देवताओं से विश्वास त्यजे जो हमें सच्चा उधार  प्रधान नहीं कर सकती.

The Gospel is exclusive, in that those that don’t believe in it won’t inherit eternal life, but are condemned to eternal damnation.

प्रभु का सुसमाचार इस मामले मे स्पष्ट है को जो प्रभु येशु मसीह को त्यज कर, किसी और पर अपना विश्वास रकता, चाहे वह कोई और देवी-देवता या मनुष्य हो, वह अनंत काल के लिए प्रभु के दंड का भोगी है।  

So these are the four foundational claims of the Gospel: That God in His Love for the world decides to save mankind from eternal damnation which they rightly deserves for not loving God, the purpose for which he is made. And in accordance with this love, God goes about granting us this eternal life not by demanding some great work of righteousness from us, but instead giving us his Son who does the work of salvation for us, through his birth, his life, his death and resurrection. And when we place our trust in this work of salvation by God, we inherit the Kingdom of God as co-heirs of Christ.This is the Gospel.

तो फिर हमने यह सीखा की सुसमाचार का मौलिक दावा यह है की प्रभु ने अपने अनंत प्रेम से प्रेरित होकर मानव जाती के उधार के लिए, ताकि वह अपने पापो के लिए अनंत काल के दंड का भोगी ना हो परंतु इस उद्देश्य से की मनुष्य प्रभु के संग अनंत जीवन प्राप्त करे उसने हमारे उधर का कार्य अपने एकलौते पुत्र येसु मसीह द्वारा पूर्ण किया. ताकि जो भी इस येसु मसीह को अपने मन मे अपने जीवन के एकलौते प्रभु के रूप मे प्रतिष्ठा करे वह अनंत काल के लिए प्रभु येसु मसीह के जन्म, जीवन, मरण और उसके पश्चात जी उठने के द्वारा प्राप्त हुए अनंत काल के जीवन का सह बोगी हो.

यह है प्रभु येसु मसीह का सुसमाचार।

[ALTAR CALL HINDI/ENGLISH]

The next five times I come here, we will together explore what it means to live by this Gospel that makes these exclusive claims about being unto our salvation.

अगली पांच बार जब मैं यहाँ आऊँगा तब मेरा प्रयास यह रहेगा की हम पवित्र वचन से यह पड़े की इस उधार प्रधान करने वाले सुसमाचार के अनुसार जीना क्या होता।

Let’s end today with this prayer. अब हम इस प्रार्थना के साथ यहाँ समाप्त करते है.